Operation Madarsa: मदरसा या ट्यूशन? उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म होने के बाद ग्राउंड पर क्या बदला? Exclusive Ground Report
Operation Madarsa: उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में राज्य में मदरसा बोर्ड समाप्त करने का फैसला लिया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार का कहना है कि राज्य में सभी शैक्षणिक संस्थानों को कानून के अनुसार संचालित किया जाएगा और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई जारी रहेगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकारी फैसले का असर वास्तव में जमीन पर दिखाई दे रहा है?
इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए You Se Uttarakhand की टीम ग्राउंड पर पहुंची।
बाहर ‘ट्यूशन’, अंदर धार्मिक शिक्षा
हमारी टीम एक ऐसे संस्थान पहुंची, जिसके बाहर ‘ट्यूशन’ लिखा हुआ था। लेकिन अंदर बच्चों को धार्मिक शिक्षा दी जा रही थी। वहां मौजूद शिक्षक ने बताया कि यह संस्थान 2013 से संचालित हो रहा है और यहां पढ़ाई के लिए फीस भी ली जाती है।
जब उनसे पूछा गया कि सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड समाप्त किए जाने के बाद आगे क्या होगा, तो उन्होंने कहा कि मामला नैनीताल हाईकोर्ट में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 8 जुलाई को है। उनका कहना था कि अदालत के फैसले के बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
‘जमीयत उलेमा-ए-हिंद का संविधान’ वाले बयान ने खड़े किए सवाल
बातचीत के दौरान एक और बयान सामने आया, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए। शिक्षक ने कहा कि उनके लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नियम महत्वपूर्ण हैं।
इस पर हमारी टीम ने सवाल किया कि भारत में तो एक ही संविधान लागू है, फिर अलग संविधान की बात क्यों?
इसके बाद बातचीत का रुख बदल गया। पहले दिए गए बयान को अलग संदर्भ में समझाने की कोशिश की गई, लेकिन इस सवाल का स्पष्ट उत्तर नहीं मिल सका।
क्या सिर्फ नाम बदलने से कानूनी स्थिति बदल जाती है?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी संस्थान के बाहर ‘मदरसा’ की जगह ‘ट्यूशन’ लिखा जाए, तो क्या उसकी कानूनी स्थिति भी बदल जाती है?
क्या वहां वही गतिविधियां जारी हैं जो पहले थीं?
यदि फीस ली जा रही है, तो वह किस नियम के तहत ली जा रही है?
क्या ऐसे संस्थानों का पंजीकरण संबंधित शिक्षा विभाग के नियमों के अनुरूप है?
इन सभी सवालों के जवाब जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होंगे।
अब नजर 8 जुलाई की सुनवाई पर
सरकार अपने फैसले को लागू करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ संस्थान अदालत में लंबित मामले का हवाला देकर अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए हैं।
अब सभी की नजर 8 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर टिकी है। अदालत का फैसला यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि आगे राज्य में ऐसे संस्थानों की कानूनी स्थिति क्या होगी।
यह रिपोर्ट किसी धर्म, समुदाय या धार्मिक शिक्षा के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। इसका उद्देश्य केवल यह जानना है कि सरकारी फैसले के बाद जमीनी स्तर पर क्या स्थिति है और कौन-कौन से कानूनी एवं प्रशासनिक सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।
जब तक न्यायालय और संबंधित विभाग अंतिम निर्णय नहीं लेते, तब तक बहस जारी रहेगी। लेकिन एक सवाल लगातार बना रहेगा—
क्या कानून केवल कागजों तक सीमित है, या उसका प्रभाव वास्तव में जमीन पर भी दिखाई दे रहा है।